आपने अक्सर देखा होगा की रेलवे, ओइनजीसी, आर्डिनेंस, IOCL आदि में अप्रेंटिस की भर्ती निकलती रहती है। अप्रेंटिसशिप, उम्मीदवारों के लिए बहुत अच्छा मौका होता है अपने कौशल को बढ़ाने के लिए। आपमें से बहुत से अभ्यार्थी होंगे जो अप्रेंटिस के बारे में नहीं जानते हैं की ये क्या होता है, इससे क्या फायदा होगा और ये कैसे करते हैं, तो इन सबकी जानकारी हम आपको इस लेख के द्वारा बताएंगे।
अप्रेंटिस क्या है
जब भी कोई अपरेंटिस भर्ती देखते हैं तो मन में सबसे पहला सवाल आता है वो ये की अप्रेंटिस क्या है ? अपरेंटिस का अर्थ होता है प्रशिक्षु। अप्रेंटिसशिप एक प्रकार की प्रशिक्षण प्रणाली है जिसमे उम्मीदवार को नौकरी के सारे गुर सिखाये जाते हैं ये एक प्रकार की ट्रेनिंग प्रक्रिया होती है इसमें आपको किसी सरकारी दफ्तर में या किसी निजी दफ्तर में होने वाले काम का प्रशक्षिण दिया जाता है।
अप्रेन्टिशशिप एक दोहरी प्रशिक्षण प्रणाली है जिसमे प्रशिक्षु उद्यौगिक पर्यवेक्षण के अंतर्गत ऑन-द-जॉब प्रशिक्षण (ओजेटी) और कक्षा संबंधित निर्देश दोनों का ज्ञान प्राप्त करता है। इसके माध्यम से प्रशिक्षु कुशल व्यवसाय के व्यावहारिक और सैद्धांतिक पहलुओं को सीखते हैं। अप्रेंटिसशिप 1 या 1.5 साल की कुशलता और योग्यता की ट्रेनिंग होती है इसमें प्रशिक्षु को कुछ रूपये भी दिए जाते हैं। साथ ही साथ आपको उसी आर्गेनाइजेशन में स्थाई नौकरी भी मिल सकती है।
भारत सरकार भी भारत वर्ष में उम्मीदवारों को कौशल बनाने के लिए बहुत सारे प्रयास कर रही है। इसके लिए भारत सरकार ने नेशनल अप्रेंटिसशिप ट्रेनिंग स्कीम, कौशल विकास योजना जैसी कई योजनाएं लागू करी हुई हैं।
अप्रेंटिस एक्ट 1961
1961 में भारत में प्रशिक्षु अधिनियम बनाया गया था। इस एक्ट के अंतर्गत उद्योगों में प्रशिक्षुओं के प्रशिक्षण के कार्यक्रम को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया था, ताकि प्रशिक्षण पाठ्यक्रम , प्रशिक्षण की अवधि आदि निर्धारित हो जो कि केन्द्रीय शिक्षुता परिषद द्वारा निर्धारित किया गया हो और प्रशिक्षण के लिए उद्योग में उपलब्ध सुविधाएं उपलब्ध हों ताकि प्रशिक्षु सारी सुविधाओं का उपयोग कर सकें।
अप्रेंटिस एक्ट 1961 में अधिनियमित और 1962 में प्रभावी रूप से लागू किया गया था। प्रारंभ में, इस अधिनियम में व्यापार शिक्षुओं के प्रशिक्षण की परिकल्पना की गई थी। लेकिन स्नातक और डिप्लोमा इंजीनियरों के प्रशिक्षण को “स्नातक” और “तकनीशियन” प्रशिक्षु के रूप में शामिल करने के लिए 1973 में इसमें संशोधन किया गया था। 1986 में इस अधिनियम को एक बार और आगे संशोधित किया गया, इसके कार्यक्षेत्र में 10+2 व्यावसायिक धाराओं का प्रशिक्षण “तकनीशियन (व्यावसायिक)” के रूप में प्रशिक्षित जाना तय किया गया।


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